बुधवार, 14 जनवरी 2015

हिन्द में हिन्दी असुरक्षित क्यूँ

चेतन भगत से आप सभी भली भांति परिचित हैं इनका परिचय देने की आवश्यकता नहीं है |फिर भी जो नहीं जानते उनके लिए बता दूँ कि ये नामी लेखक चेतन भगत हैं “हाफ गर्लफ्रेंड” , “द थ्री मिस्टेक्स ऑफ़ माय लाइफ” , “वन नाईट एट द कॉल सेंटर” के साथ ही कई किताबों के लेखक | इनका कथन है “रोमन लिपि को अपनाकर हिन्दी को बचा सकते हैं” | इनके इस कथन ने मेरे मन में कुछ प्रश्नों को जन्म दिया ,मैं इनसे (और सभी से) ये प्रश्न पूछना चाहती हूँ कि जब ये स्वयं इनके अनुसार हिन्दी प्रेमी हैं तो क्या हिन्दी प्रेमी होने के नाते इनका दायित्व हिन्दी भाषा के प्रयोग को बढ़ावा देना नहीं है ? या हम इन्हें रोमन लिपि प्रेमी कह सकते हैं | क्या ये हिन्दी के सौन्दर्य में मिलावट करके उसे अशुद्ध करना नहीं होगा? हिन्दी स्वयं में एक पूर्ण भाषा है इसे बोलने लिखने या समझने के लिए किसी सहायक भाषा की कोई आवश्यकता नहीं है| बेशक रोमन लिपि का प्रयोग whatsapp, facebook और मेसेजिंग में किया जा रहा है परन्तु चेतन जी ये बताएं कि क्या whatsapp और facebook में रोमन लिपि  का उपयोग हिन्दी के महत्व को निर्धारित करेगा या हिन्दी के प्रयोग को प्रोत्साहित कर सकेगा | हम बात करते हैं शिक्षा के क्षेत्र में हिन्दी का प्रभुत्व हो , रोज़गार के क्षेत्र में हिन्दी को वरीयता मिले , मेडिकल की पढ़ाई से लेकर दवाओं के नाम तक हिन्दी में लिखे हों , ये इसीलिए कि हिन्दी समझने में आसान है, क्या रोमन लिपि यहाँ और समस्याएं नहीं खड़ी कर देगी या देश केवल whatsapp और facebook के सहारे ही चल रहा है |
                          मेरा प्रश्न ये भी है क्यूँ हिन्दी भाषा के मूल रुप के साथ प्रयोग किये जा रहे हैं क्यूँ उसे रोमन लिपि की आवश्यकता पड़े| क्यूँ हिन्दी को उसके मूल रूप में नहीं अपनाया जा सकता | हिन्दी सम्पूर्ण भाषा है जिसे समझने के लिए सुधार की या सहायक भाषाओँ की आवश्यकता कतई नहीं है|
                  वक़्त के साथ बदलने का अर्थ ये नहीं कि एक का अस्तित्व और महत्व समाप्त करके दूसरे को स्थापित कर दिया जाए |आज हिन्दी भाषा व हिन्दी भाषा प्रेमी अपने अस्तित्व और सम्मान को पुनः पाने के लिए पहले ही बहुत परिश्रम कर रहे हैं ऐसे में रोमन लिपि भी हिन्दी भाषा के लिए एक संकट ही है |
                  भारत हिन्दी भाषी देश है और यहाँ बोले जाने वाली भाषाएँ हिन्दी का ही अंग हैं | अंग्रेज़ी भाषा की लिपि बिलकुल अलग है और अंग्रेज़ी ने हिन्दी भाषा के लिए अपना ही स्थान असुरक्षित कर दिया हमने कहा इसका कारण शिक्षा और कैरियर में अंग्रेज़ी की मांग है , लोगों को यहाँ पढ़ लिखकर पैसा कमाने के लिए विदेशों की सेवायें करनी थीं | हिन्दी को मातृभाषा का स्थान मिला किन्तु आज हिन्द में हिन्दी असुरक्षित है |अंग्रेज़ी का सत्तावादी रुख हिन्दी के पतन का कारण बन रहा है , कुछ मुट्ठी भर लोग हिन्दी को उसका अधिकार दिलाने के लिए जी जान से प्रयासरत हैं भी किन्तु संभवतः ये पर्याप्त कभी नहीं हो सकते | यहाँ मैं ये भी कहना चाहती हूँ कि बदलाव का नियम हर जगह सामान रूप से लागू नहीं होता| क्या हम ये करें कि अगर भूगोल की दृष्टि से देश को समझने में कठिनाई हो रही है तो हमें सारे पर्वत पहाड़ों को काटकर समुद्र में डाल देना चाहिए ताकि एकरूपता आ जाए , सारे फूल एक रंग के कर दिए जायें, सभी वृक्षों का आकार प्रकार एक सा हो तो समझने में आसानी होगी | यदि ये संभव और आवश्यक नहीं तो हिन्दी भाषा के साथ खिलवाड़ भी न तो आवश्यक है और न ही संभव होगा |
       हिन्दी का अस्तित्व और सम्मान बनाये रखना , हिन्दी के प्रयोग को प्रोत्साहित करना प्रत्येक हिन्दुस्तानी का देश के प्रति प्रथम कर्तव्य तो है ही ज़िम्मेदारी भी है | इसमें समाज के ज़िम्मेदार और नामी वर्ग से अधिक युवाओं से आशा हैं |