गुरुवार, 1 जनवरी 2015

जो तुम न होते

जो तुम न होते
कौन जीवन के कागज़ पर
संबंधों की रूप रेखा उकेरता
मैं और तुम
इन दो रंगों को सतरंगी करता
आत्मसम्मान के घर बनाता
नियंत्रण के अडिग पेड़ पर
समर्पण की लताएं चढ़ाता
स्मित के नव पुष्प खिलाता

जो तुम न होते
साहस के सूरज कौन उगाता
दृढ़ता के पर्वतों से
नेह की सरिता कौन बहाता
कौन निश्चय की नाव को
गंतव्य की दिशा दिखाता

जो तुम न होते
कौन मुझ अधीर को गढ़ता
धीर की धरा पर
अटल प्रस्तर बनाता

जो तुम न होते
तो होता कुछ अनगढ़ा
रंगहीन दिशा से विलग
और आकृतिहीन जीवन

जो तुम हो
तो संभावनाओं के आकाश पर
निडर हो उड़ रहे हैं
प्रयासों के पंछी
विश्वास है कि
जो ये चित्र तुमने गढ़ा है मेरे जीवन का
पंछियों को गंतव्यों पर ही
मिलेगा विराम