मन के भाव, शिकवे और मुहब्बत के अनेक रंग मिलकर एक नये कलेवर की रचना करते है, जिन्हें मैं जज़्बात के नाम से जानती हूँ |इन्ही जज्बातों को समेटे आपसे रू-ब-रू हूँ |
गुरुवार, 15 जनवरी 2015
जज़्बात : वचन कोशिश के होते हैं नतीजों के नहीं होते
जज़्बात : वचन कोशिश के होते हैं नतीजों के नहीं होते: परिंदे आसमानों के दरीचों के नहीं होते , चमन में रहके भी कुछ गुल बगीचों के नहीं होते| तुम्हें कैसे वचन दूँ चाँद को बाँहों में ला दूंगी ,...
बुधवार, 14 जनवरी 2015
जज़्बात : हिन्द में हिन्दी असुरक्षित क्यूँ
जज़्बात : हिन्द में हिन्दी असुरक्षित क्यूँ: चेतन भगत से आप सभी भली भांति परिचित हैं इनका परिचय देने की आवश्यकता नहीं है |फिर भी जो नहीं जानते उनके लिए बता दूँ कि ये नामी लेखक चेत...
हिन्द में हिन्दी असुरक्षित क्यूँ
चेतन भगत से आप सभी
भली भांति परिचित हैं इनका परिचय देने की आवश्यकता नहीं है |फिर भी जो नहीं जानते
उनके लिए बता दूँ कि ये नामी लेखक चेतन भगत हैं “हाफ गर्लफ्रेंड” , “द थ्री
मिस्टेक्स ऑफ़ माय लाइफ” , “वन नाईट एट द कॉल सेंटर” के साथ ही कई किताबों के लेखक
| इनका कथन है “रोमन लिपि को अपनाकर हिन्दी को बचा सकते हैं” | इनके इस कथन ने मेरे मन में कुछ प्रश्नों को जन्म दिया ,मैं इनसे (और सभी
से) ये प्रश्न पूछना चाहती हूँ कि जब ये स्वयं इनके अनुसार हिन्दी प्रेमी हैं तो क्या
हिन्दी प्रेमी होने के नाते इनका दायित्व हिन्दी भाषा के प्रयोग को बढ़ावा देना नहीं
है ? या हम इन्हें रोमन लिपि प्रेमी कह सकते हैं | क्या ये हिन्दी के सौन्दर्य में
मिलावट करके उसे अशुद्ध करना नहीं होगा? हिन्दी स्वयं में एक पूर्ण भाषा है इसे
बोलने लिखने या समझने के लिए किसी सहायक भाषा की कोई आवश्यकता नहीं है| बेशक रोमन
लिपि का प्रयोग whatsapp, facebook और मेसेजिंग में किया जा रहा है परन्तु चेतन जी
ये बताएं कि क्या whatsapp और facebook में रोमन लिपि का उपयोग हिन्दी के महत्व को निर्धारित करेगा या
हिन्दी के प्रयोग को प्रोत्साहित कर सकेगा | हम बात करते हैं शिक्षा के क्षेत्र
में हिन्दी का प्रभुत्व हो , रोज़गार के क्षेत्र में हिन्दी को वरीयता मिले ,
मेडिकल की पढ़ाई से लेकर दवाओं के नाम तक हिन्दी में लिखे हों , ये इसीलिए कि
हिन्दी समझने में आसान है, क्या रोमन लिपि यहाँ और समस्याएं नहीं खड़ी कर देगी या
देश केवल whatsapp और facebook के सहारे ही चल रहा है |
मेरा प्रश्न ये भी है
क्यूँ हिन्दी भाषा के मूल रुप के साथ प्रयोग किये जा रहे हैं क्यूँ उसे रोमन लिपि
की आवश्यकता पड़े| क्यूँ हिन्दी को उसके मूल रूप में नहीं अपनाया जा सकता | हिन्दी सम्पूर्ण
भाषा है जिसे समझने के लिए सुधार की या सहायक भाषाओँ की आवश्यकता कतई नहीं है|
वक़्त के साथ बदलने का अर्थ ये
नहीं कि एक का अस्तित्व और महत्व समाप्त करके दूसरे को स्थापित कर दिया जाए |आज
हिन्दी भाषा व हिन्दी भाषा प्रेमी अपने अस्तित्व और सम्मान को पुनः पाने के लिए
पहले ही बहुत परिश्रम कर रहे हैं ऐसे में रोमन लिपि भी हिन्दी भाषा के लिए एक संकट
ही है |
भारत हिन्दी भाषी देश है और यहाँ बोले जाने वाली
भाषाएँ हिन्दी का ही अंग हैं | अंग्रेज़ी भाषा की लिपि बिलकुल अलग है और अंग्रेज़ी
ने हिन्दी भाषा के लिए अपना ही स्थान असुरक्षित कर दिया हमने कहा इसका कारण शिक्षा
और कैरियर में अंग्रेज़ी की मांग है , लोगों को यहाँ पढ़ लिखकर पैसा कमाने के लिए
विदेशों की सेवायें करनी थीं | हिन्दी को मातृभाषा का स्थान मिला किन्तु आज हिन्द
में हिन्दी असुरक्षित है |अंग्रेज़ी का सत्तावादी रुख हिन्दी के पतन का कारण बन रहा
है , कुछ मुट्ठी भर लोग हिन्दी को उसका अधिकार दिलाने के लिए जी जान से प्रयासरत
हैं भी किन्तु संभवतः ये पर्याप्त कभी नहीं हो सकते | यहाँ मैं ये भी कहना चाहती
हूँ कि बदलाव का नियम हर जगह सामान रूप से लागू नहीं होता| क्या हम ये करें कि अगर
भूगोल की दृष्टि से देश को समझने में कठिनाई हो रही है तो हमें सारे पर्वत पहाड़ों
को काटकर समुद्र में डाल देना चाहिए ताकि एकरूपता आ जाए , सारे फूल एक रंग के कर
दिए जायें, सभी वृक्षों का आकार प्रकार एक सा हो तो समझने में आसानी होगी | यदि ये
संभव और आवश्यक नहीं तो हिन्दी भाषा के साथ खिलवाड़ भी न तो आवश्यक है और न ही संभव
होगा |
हिन्दी का अस्तित्व और सम्मान बनाये रखना
, हिन्दी के प्रयोग को प्रोत्साहित करना प्रत्येक हिन्दुस्तानी का देश के प्रति
प्रथम कर्तव्य तो है ही ज़िम्मेदारी भी है | इसमें समाज के ज़िम्मेदार और नामी वर्ग
से अधिक युवाओं से आशा हैं |
गुरुवार, 1 जनवरी 2015
जो तुम न होते
जो तुम न होते
कौन जीवन के कागज़ पर
संबंधों की रूप रेखा उकेरता
मैं और तुम
इन दो रंगों को सतरंगी करता
आत्मसम्मान के घर बनाता
नियंत्रण के अडिग पेड़ पर
समर्पण की लताएं चढ़ाता
स्मित के नव पुष्प खिलाता
जो तुम न होते
साहस के सूरज कौन उगाता
दृढ़ता के पर्वतों से
नेह की सरिता कौन बहाता
कौन निश्चय की नाव को
गंतव्य की दिशा दिखाता
जो तुम न होते
कौन मुझ अधीर को गढ़ता
धीर की धरा पर
अटल प्रस्तर बनाता
जो तुम न होते
तो होता कुछ अनगढ़ा
रंगहीन दिशा से विलग
और आकृतिहीन जीवन
जो तुम हो
तो संभावनाओं के आकाश पर
निडर हो उड़ रहे हैं
प्रयासों के पंछी
विश्वास है कि
जो ये चित्र तुमने गढ़ा है मेरे जीवन का
पंछियों को गंतव्यों पर ही
मिलेगा विराम
कौन जीवन के कागज़ पर
संबंधों की रूप रेखा उकेरता
मैं और तुम
इन दो रंगों को सतरंगी करता
आत्मसम्मान के घर बनाता
नियंत्रण के अडिग पेड़ पर
समर्पण की लताएं चढ़ाता
स्मित के नव पुष्प खिलाता
जो तुम न होते
साहस के सूरज कौन उगाता
दृढ़ता के पर्वतों से
नेह की सरिता कौन बहाता
कौन निश्चय की नाव को
गंतव्य की दिशा दिखाता
जो तुम न होते
कौन मुझ अधीर को गढ़ता
धीर की धरा पर
अटल प्रस्तर बनाता
जो तुम न होते
तो होता कुछ अनगढ़ा
रंगहीन दिशा से विलग
और आकृतिहीन जीवन
जो तुम हो
तो संभावनाओं के आकाश पर
निडर हो उड़ रहे हैं
प्रयासों के पंछी
विश्वास है कि
जो ये चित्र तुमने गढ़ा है मेरे जीवन का
पंछियों को गंतव्यों पर ही
मिलेगा विराम
मंगलवार, 11 नवंबर 2014
परदेसी साजनवा
का खोये का पाये हो परदेस में जाके साजनवा ,
लगते अऊर पराये हो परदेस में जाके साजनवा ।
याद करे हैं तुमको गाँव के बछड़े नदिया खेत हवा ,
तुम तो सब बिसराये हो परदेस में जाके साजनवा ।
यहाँ तो हर एक बच्चा बूढा नाम तुम्हारे जाने है ,
ठेंगा नाम कमाये हो परदेस में जाके साजनवा ।
सूट बूट अंगरेजी कपडे और विदेसी गाड़ी भी,
झूठा मान सजाये हो परदेस में जाके साजनवा ।
बुधवार, 21 मई 2014
तुम मुस्कुराते रहना
तुम्हारी यादों को सहेज रखा है ,
जिसमे तुम्हारी महक ज्यादा थी
उन गुलाबों में
जो तुम्हारी बाहें ज्यादा थी
उस शाल में,
जिसमे तुम्हारा नाम लिखा था
उस ख़त में,
जो तुम्हारे साथ गुनगुनाते थे
झूमते थे तुम्हारे गीतों पर
उन पत्तों में
जो रात भर हमारे साथ जागता था
उस चाँद में ,
सब मुस्कुराते थे तुम्हारी यादों में
अब जाने क्यूँ खामोश हैं...
सुनो
कहीं तुम उदास तो नहीं
हाँ शायद
इसीलिए मुरझा रहे हैं
गुलाब
शाल भी गर्माहट नहीं देती
ख़त भी चुप है
और पत्ते
वो तो बेजान ही हो गए हैं ,
मैं जानती हूँ
तुम ऐसा नहीं चाहोगे कभी
देखो
तुम मुस्कुराते रहना
ये भी मुस्कुराते रहेंगे
और
इनके साथ मैं भी
तुम्हारी यादों में...........
कनुप्रिया
जिसमे तुम्हारी महक ज्यादा थी
उन गुलाबों में
जो तुम्हारी बाहें ज्यादा थी
उस शाल में,
जिसमे तुम्हारा नाम लिखा था
उस ख़त में,
जो तुम्हारे साथ गुनगुनाते थे
झूमते थे तुम्हारे गीतों पर
उन पत्तों में
जो रात भर हमारे साथ जागता था
उस चाँद में ,
सब मुस्कुराते थे तुम्हारी यादों में
अब जाने क्यूँ खामोश हैं...
सुनो
कहीं तुम उदास तो नहीं
हाँ शायद
इसीलिए मुरझा रहे हैं
गुलाब
शाल भी गर्माहट नहीं देती
ख़त भी चुप है
और पत्ते
वो तो बेजान ही हो गए हैं ,
मैं जानती हूँ
तुम ऐसा नहीं चाहोगे कभी
देखो
तुम मुस्कुराते रहना
ये भी मुस्कुराते रहेंगे
और
इनके साथ मैं भी
तुम्हारी यादों में...........
कनुप्रिया
बुधवार, 2 अप्रैल 2014
अभी कैसे कहूँ कि वो मेरा परवाना है |
मेरी गलियों में महज़ जिसका आना जाना है|
न जाने क्यूँ ये जगह और भी अपनी सी लगी|
इसीशहर में सुना है तेरा ठिकाना है|
ये राहें उँगलियाँ पकडे मुझे किस ओर ले जाती |
कदम ये जानते हैं क्या कि तेरी ओर आना है |
मुझे तुम लाख रोको अपने दिल के पास आने से|
मेरी चाहत कि किताबों का तू फ़साना है |
सनम कातिल नज़र पे मालिकाना हक़ तुम्हारा है|
चलाओ तीर नज़रों के मेरा भी दिल निशाना है |
अदावत है ज़माने से तुझे लेकर के जन्मों से |
खुदाई हार जायेगी हमारा दिल दीवाना है |
मुहब्बत का सफ़र ऐसे ही भला खत्म कैसे हो|
अभी तो देखना छूना है गले भी लगाना है |
मंगलवार, 4 फ़रवरी 2014
जुड़ गया बहुत कुछ तुम्हारे आने से
बदल गया सब
मेरे जीवन में
तुम्हारे आने से
ना ...... बदला नहीं
जुड़ गया है कुछ
बहुत कुछ
अब दिलचस्पी ख़बरों में है
तुम्हारे शहर की
अखबार का वो राशि वाला कॉलम
पढ़ती हूँ उसमे अब
एक राशि और
जैसे यहीं से जान लूंगी
क्या क्या करोगे आज तुम
तुम भी तो देखते होगे न
एक राशि और
एक कप चाय और सुबह का सूरज
तुम भी इसी की किरण के साथ होगे
मेरी तरह
देखते होगे इसे
चाय के कप के साथ
और इसके ज़रिये
मुझे |||||||||||
मेरे जीवन में
तुम्हारे आने से
ना ...... बदला नहीं
जुड़ गया है कुछ
बहुत कुछ
अब दिलचस्पी ख़बरों में है
तुम्हारे शहर की
अखबार का वो राशि वाला कॉलम
पढ़ती हूँ उसमे अब
एक राशि और
जैसे यहीं से जान लूंगी
क्या क्या करोगे आज तुम
तुम भी तो देखते होगे न
एक राशि और
एक कप चाय और सुबह का सूरज
तुम भी इसी की किरण के साथ होगे
मेरी तरह
देखते होगे इसे
चाय के कप के साथ
और इसके ज़रिये
मुझे |||||||||||
शुक्रवार, 10 जनवरी 2014
ख़याल हो तुम
तुम्हें याद है वो दिन
जब भटक गए थे हम
शहर से दूर जंगल में
बरसात की तूफानी रात
और तुम्हारी बाहें
कहाँ कोई डर था मुझे
तुम थे न सायबान मेरे |
बारिश की हर बूँद
खीच रही थी एक रेखा
जो मेरे दिल से रास्ता थी
तुम्हारे दिल का
पानी की एक एक बूँद
मन की आग में घी की तरह
बढा रही थी लपटों को
और तुम
तुमने भी तो कहा था
"जल जाना चाहता हूँ
भीगे होंठों की आग से "
मेरे नैनो ने झुककर दी थी मौन स्वीकृति
तन ने तुम्हारी बाहों में समर्पण
और अधरों ने मांग लिया था
अधिकार अपना |
जाने खोया था सब कुछ या
सब कुछ पा लिया था उस दिन
अब जाती नहीं तुम्हारी सौंधी सी महक
सांसों से आँखों से दिल से और होंठों से भी
बस चले गए तो वो पल
जिन्हें बाँध न सकी आँचल के छोर से
लेकिन मैं महकूंगी सदा
तुम्हारी महक से
क्यूंकि बस तुम्हारी महक ही तो मेरी है
अब तुम कहो भटक गए थे ?
या पा लिया था मंजिल को
बाँहों से होकर
एक दुसरे की आँखों में |
जब भटक गए थे हम
शहर से दूर जंगल में
बरसात की तूफानी रात
और तुम्हारी बाहें
कहाँ कोई डर था मुझे
तुम थे न सायबान मेरे |
बारिश की हर बूँद
खीच रही थी एक रेखा
जो मेरे दिल से रास्ता थी
तुम्हारे दिल का
पानी की एक एक बूँद
मन की आग में घी की तरह
बढा रही थी लपटों को
और तुम
तुमने भी तो कहा था
"जल जाना चाहता हूँ
भीगे होंठों की आग से "
मेरे नैनो ने झुककर दी थी मौन स्वीकृति
तन ने तुम्हारी बाहों में समर्पण
और अधरों ने मांग लिया था
अधिकार अपना |
जाने खोया था सब कुछ या
सब कुछ पा लिया था उस दिन
अब जाती नहीं तुम्हारी सौंधी सी महक
सांसों से आँखों से दिल से और होंठों से भी
बस चले गए तो वो पल
जिन्हें बाँध न सकी आँचल के छोर से
लेकिन मैं महकूंगी सदा
तुम्हारी महक से
क्यूंकि बस तुम्हारी महक ही तो मेरी है
अब तुम कहो भटक गए थे ?
या पा लिया था मंजिल को
बाँहों से होकर
एक दुसरे की आँखों में |
शुक्रवार, 3 जनवरी 2014
ख्वाहिशें
दिन रात बरसे बादल बिखरे जहाँ में खुश्बू ।
इतनी खुदा ने बख्शी बहारों को ख्वाहिशें ॥
छूकर लबों को उसके ही इश्क़ निखरता है ।
छूकर उसी को निखरी निखारो की ख्वाहिशें ॥
महफ़िल में मुझको आकर इस तरह छेड़ती है ।
नज़रों ने दी हैं उनके इशारों को ख्वाहिशें ॥
चेहरे में उसके चन्दा के नूर की झलक है ।
आँखों में चमकती हैं सितारों की ख्वाहिशें ॥
मिलने से बेग़रज़ हैं और दूर भी नहीं।
इतनी अता हुई हैं किनारों को ख्वाहिशें ॥
वो जान मांगते हैं जिनको दिल ये दे दिया ।
मौला मेरे अजब दी हमारों को ख्वाहिशें ॥
मंगलवार, 31 दिसंबर 2013
२०१४ स्वागत है तुम्हारा
आने वाले सुनो |
तुम मेरे लिए वो धरती हो जिस पर मेरी उम्मीदों,आशाओं,सपनो और सत्यता के फूल खिलेंगे| तुम्हारा इंतज़ार कठिन होता जा रहा है | होंठों पर मुस्कान और मन में हर्ष लिए अपनी बाहें फैलाये तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं इस विश्वास के साथ की तुम अपने साथ मेरी दुनिया, मेरे सारे संसार के लिए ढेर सारी खुशियाँ, हर माता-पिता के लिए आदर , बहिन-बेटियों के लिए सम्मान और सुरक्षित माहौल, बच्चों के लिए उज्जवल भविष्य, युवाओं के लिए सही दिशा का ज्ञान, हर एक व्यक्ति के लिए संयम, सुशासन और तुम्हारे बाद भी न जाने वाली मुस्कराहट लाओगे| पूरा भरोसा रखे हैं तुम पर कि तुम ये उम्मीदें नहीं तोड़ोगे |
तुम्हारे इंतज़ार में...............
.............मैं.......... .............
तुम मेरे लिए वो धरती हो जिस पर मेरी उम्मीदों,आशाओं,सपनो और सत्यता के फूल खिलेंगे| तुम्हारा इंतज़ार कठिन होता जा रहा है | होंठों पर मुस्कान और मन में हर्ष लिए अपनी बाहें फैलाये तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं इस विश्वास के साथ की तुम अपने साथ मेरी दुनिया, मेरे सारे संसार के लिए ढेर सारी खुशियाँ, हर माता-पिता के लिए आदर , बहिन-बेटियों के लिए सम्मान और सुरक्षित माहौल, बच्चों के लिए उज्जवल भविष्य, युवाओं के लिए सही दिशा का ज्ञान, हर एक व्यक्ति के लिए संयम, सुशासन और तुम्हारे बाद भी न जाने वाली मुस्कराहट लाओगे| पूरा भरोसा रखे हैं तुम पर कि तुम ये उम्मीदें नहीं तोड़ोगे |
तुम्हारे इंतज़ार में...............
.............मैं..........
२०१३ अलविदा
जा रहे हो??????
तुम्हे तो जाना ही था, बहुत खुशियाँ दी हैं तुमने मुझे | जब भी अपनी खुशियों का और यादगार लम्हों का हिसाब करने बैठूंगी तुम्हारा ज़िक्र ज़रूर होगा, तुम्हें भूल पाना तो असंभव है ही लेकिन तुम याद भी बहुत आओगे | बहुत चाहा की तुम न जाओ लेकिन तुम रुक भी तो नहीं सकते| कितना मुश्किल है तुम्हें जाते हुए देखना| तुम्हारे जाने का वक़्त बस आ ही गया है , जानती हूँ कि इस ज़िंदगी में तुम दुबारा नहीं लौटोगे | गुज़रते हुए हर पल के साथ तुम्हारी यादें ताज़ा होती जा रही हैं| तुम न जाओ ये तो कहना भी व्यर्थ है क्यूंकि तुम्हें तो जाना ही था | अलविदा अलविदा अलविदा |
......... तुम्हे विदा दे रही.............
................मैं........................
मंगलवार, 3 दिसंबर 2013
बिदाई
माँ मेरा नन्हा सा दिल है, इसको तू ये ठेस न दे।
भैया को दे देना सबकुछ , मुझको तू परदेस न दे॥
बाबुल का प्यारा सा आँगन, अंगनाई बेरी का पेड़ ।
शाम ढले दो ख़ास सहेली , गुड्डे गुड़ियों का वो खेल॥
फिर क्या मुझसे भूल हुई, क्यूँ ब्याह मेरा तू करती है।
बेटी कहीं क्यूँ पैदा होती, किसी के घर क्यूँ मरती है॥
माँ कहती है सुन मेरी बेटी, करना तेरी बिदाई है।
मैंने जनम दिया है लेकिन, मेरी नहीं पराई है॥
मेरी गुड़िया हर बेटी का , होता यही फ़साना है।
मैंने बाबुल का घर छोड़ा, अब तुझको भी जाना है॥
जा बिटिया तू साथ पीया के, सुख दुःख जो हो सह लेना।
अपने साजन की सुन लेना, साजन से ही कह लेना॥
रिश्ता तेरा मेरा क्या है, कैसी अजब पहेली है।
तू बेटी है तू हमदम है, या तू मेरी सहेली है॥
भैया को दे देना सबकुछ , मुझको तू परदेस न दे॥
बाबुल का प्यारा सा आँगन, अंगनाई बेरी का पेड़ ।
शाम ढले दो ख़ास सहेली , गुड्डे गुड़ियों का वो खेल॥
फिर क्या मुझसे भूल हुई, क्यूँ ब्याह मेरा तू करती है।
बेटी कहीं क्यूँ पैदा होती, किसी के घर क्यूँ मरती है॥
माँ कहती है सुन मेरी बेटी, करना तेरी बिदाई है।
मैंने जनम दिया है लेकिन, मेरी नहीं पराई है॥
मेरी गुड़िया हर बेटी का , होता यही फ़साना है।
मैंने बाबुल का घर छोड़ा, अब तुझको भी जाना है॥
जा बिटिया तू साथ पीया के, सुख दुःख जो हो सह लेना।
अपने साजन की सुन लेना, साजन से ही कह लेना॥
रिश्ता तेरा मेरा क्या है, कैसी अजब पहेली है।
तू बेटी है तू हमदम है, या तू मेरी सहेली है॥
गुरुवार, 28 नवंबर 2013
इस सम्त मोहब्बत से कोई वास्ता तो हो ।
अब मुस्कुरा दे वो यूँ कोई हादसा तो हो॥
वो लौट न पाया अगर उसका कुसूर क्या।
परदेस से आने का कोई रास्ता तो हो॥
वो देखे मुस्कुराये कोई बात तो करे।
इस दिल को लगाने का कोई सिलसिला तो हो॥
न नज्र मुलाकात न ही ख़त कोई लिक्खे।
दोनों के दरमयान कोई फासला तो हो॥
मैं बुत का क्या करूँ कि अकीदत ही तुझसे है।
मानिंद सताइश का कोई काफिला तो हो॥
अफ्शा-इ-राजे-इश्क़ भी मुमकिन ही था "ग़ज़ल"।
उफ़तादगी से अपना कोई राब्ता तो हो ॥
सोमवार, 8 जुलाई 2013
ये एक कहानी है।
थम जाओ मेरे जानिब इक बात बतानी है,
आंखों मे तेरी सूरत होंठों पे कहानी है।
बे ज़बां हैं नज़रें तो रूह भी सरकश है,
एह्सास से आरी हुं ये कैसी जवानी है।
इस दर्ज़ा सुलगती हैं सांसें तमाम रातें,
क्या है यही वो वह्शत क्या ये ही रवानी है।
चूड़ी का एक टुकड़ा सूखा हुआ सा पत्ता,
इस सम्त मुहब्बत की बस ये ही निशानी है।
तुमने भी सुन रखे हैं ये राज़ तो नहीं हैं,
जो कह रही हूं तुमसे ये बात पुरानी है।
कैसी है गर्ज़-ए-चाहत हम पा-ए-यार बैठे,
हसता वो बेतहाशा मेरी आंख मे पानी है।
आंखों मे तेरी सूरत होंठों पे कहानी है।
बे ज़बां हैं नज़रें तो रूह भी सरकश है,
एह्सास से आरी हुं ये कैसी जवानी है।
इस दर्ज़ा सुलगती हैं सांसें तमाम रातें,
क्या है यही वो वह्शत क्या ये ही रवानी है।
चूड़ी का एक टुकड़ा सूखा हुआ सा पत्ता,
इस सम्त मुहब्बत की बस ये ही निशानी है।
तुमने भी सुन रखे हैं ये राज़ तो नहीं हैं,
जो कह रही हूं तुमसे ये बात पुरानी है।
कैसी है गर्ज़-ए-चाहत हम पा-ए-यार बैठे,
हसता वो बेतहाशा मेरी आंख मे पानी है।
शुक्रवार, 5 जुलाई 2013
बिसात-ए-इश्क पे कुर्बान है इक और कहानी ।
बहुत ख़ामोश है कल से मुहब्बत की रवानी भी,
बहुत चुभती हैं ये रातें मुसलसल आँख में पानी ।
जुदाई की वो शब थी और दिल मजरूह था मेरा,
तड़पता जिस्म था मेरा ही और थी रूह बेगानी ।
मुसलसल हिज्र की रातें बयां करते नहीं बनती ,
मेरा आगाज़ था बा-खैर और अंजाम तूफानी ।
हयाते आरज़ू से मैंने भी माँगा कज़ा का दिन,
बिसात-ए-इश्क पे कुर्बान है इक और कहानी ।
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