मंगलवार, 11 नवंबर 2014

परदेसी साजनवा




का खोये का पाये हो परदेस में जाके साजनवा ,
लगते अऊर पराये हो परदेस में जाके साजनवा ।

याद करे हैं तुमको गाँव के बछड़े नदिया खेत हवा ,
तुम तो सब बिसराये हो परदेस में जाके साजनवा ।

यहाँ तो हर एक बच्चा बूढा नाम तुम्हारे जाने है ,
ठेंगा नाम कमाये हो परदेस में जाके साजनवा ।

सूट बूट अंगरेजी कपडे और विदेसी गाड़ी भी,
झूठा मान सजाये हो परदेस में जाके साजनवा । 
मेरी हयात में वो गुमाँ-ए-खुदा रहा। 
वो मुझमें रहा और न मुझसे जुदा रहा ।। 
पोशीदा चाहतों का ये अंजाम देखिए। 
हम हद में रहे और वो हद से ख़फा रहा ।।

बुधवार, 21 मई 2014

तुम मुस्कुराते रहना

तुम्हारी यादों को सहेज रखा है ,
जिसमे तुम्हारी महक ज्यादा थी
उन गुलाबों में
जो तुम्हारी बाहें ज्यादा थी
उस शाल में,
जिसमे तुम्हारा नाम लिखा था
उस ख़त में,
जो तुम्हारे साथ गुनगुनाते थे
झूमते थे तुम्हारे गीतों पर
उन पत्तों में
जो रात भर हमारे साथ जागता था
उस चाँद में ,
सब मुस्कुराते थे तुम्हारी यादों में
अब जाने क्यूँ खामोश हैं...
सुनो
कहीं तुम उदास तो नहीं
हाँ शायद
इसीलिए मुरझा रहे हैं
गुलाब
शाल भी गर्माहट नहीं देती
ख़त भी चुप है
और पत्ते
वो तो बेजान ही हो गए हैं ,
मैं जानती हूँ
तुम ऐसा नहीं चाहोगे कभी
देखो
तुम मुस्कुराते रहना
ये भी मुस्कुराते रहेंगे
और
इनके साथ मैं भी
तुम्हारी यादों में...........

कनुप्रिया

बुधवार, 2 अप्रैल 2014


अभी कैसे कहूँ कि वो मेरा परवाना है |
मेरी गलियों में महज़ जिसका आना जाना है|

न जाने क्यूँ ये जगह और भी अपनी सी लगी|
इसीशहर में सुना है तेरा ठिकाना है|

ये राहें उँगलियाँ पकडे मुझे किस ओर ले जाती |
कदम ये जानते हैं क्या कि तेरी ओर आना है |

मुझे तुम लाख रोको अपने दिल के पास आने से|
मेरी चाहत कि किताबों का तू फ़साना है |

सनम कातिल नज़र पे मालिकाना हक़ तुम्हारा है|
चलाओ तीर नज़रों के मेरा भी दिल निशाना है |

अदावत है ज़माने से तुझे लेकर के जन्मों से |
खुदाई हार जायेगी हमारा दिल दीवाना है |

मुहब्बत का सफ़र ऐसे ही भला खत्म कैसे हो|
अभी तो देखना छूना है गले भी लगाना है |

मंगलवार, 4 फ़रवरी 2014

जुड़ गया बहुत कुछ तुम्हारे आने से

बदल गया सब
मेरे जीवन में
तुम्हारे आने से
ना ...... बदला नहीं
जुड़ गया है कुछ
बहुत कुछ
अब दिलचस्पी ख़बरों में है
तुम्हारे शहर की
अखबार का वो राशि वाला कॉलम
पढ़ती हूँ उसमे अब
एक राशि और
जैसे यहीं से जान लूंगी
क्या क्या करोगे आज तुम
तुम भी तो देखते होगे न
एक राशि और
एक कप चाय और सुबह का सूरज
तुम भी इसी की किरण के साथ होगे
मेरी तरह
देखते होगे इसे
चाय के कप के साथ
और इसके ज़रिये
मुझे |||||||||||

शुक्रवार, 10 जनवरी 2014

ख़याल हो तुम

तुम्हें याद है वो दिन
जब भटक गए थे हम
शहर से दूर जंगल में
बरसात की तूफानी रात
और तुम्हारी बाहें
कहाँ कोई डर था मुझे
तुम थे न सायबान मेरे |

बारिश की हर बूँद
खीच रही थी एक रेखा
जो मेरे दिल से रास्ता थी
तुम्हारे दिल का
पानी की एक एक बूँद
मन की आग में घी की तरह
बढा रही थी लपटों को
और तुम
तुमने भी तो कहा था
"जल जाना चाहता हूँ
भीगे होंठों की आग से "
मेरे नैनो ने झुककर दी थी मौन स्वीकृति
तन ने तुम्हारी बाहों में समर्पण
और अधरों ने मांग लिया था
अधिकार अपना |


जाने खोया था सब कुछ या
सब कुछ पा लिया था उस दिन
अब जाती नहीं तुम्हारी सौंधी सी महक
सांसों से आँखों से दिल से और होंठों से भी
बस चले गए तो वो पल
जिन्हें बाँध न सकी आँचल के छोर से
लेकिन मैं महकूंगी सदा
तुम्हारी महक से
क्यूंकि बस तुम्हारी महक ही तो मेरी है


अब तुम कहो भटक गए थे ?
या पा लिया था मंजिल को
बाँहों से होकर
एक दुसरे की आँखों में |

शुक्रवार, 3 जनवरी 2014

ख्वाहिशें


दिन रात बरसे बादल बिखरे जहाँ में खुश्बू । 
इतनी खुदा ने बख्शी बहारों को ख्वाहिशें ॥ 

छूकर लबों को उसके ही इश्क़ निखरता है । 
छूकर उसी को निखरी निखारो की ख्वाहिशें ॥ 

महफ़िल में मुझको आकर इस तरह छेड़ती है । 
नज़रों ने दी हैं उनके इशारों को ख्वाहिशें ॥ 

चेहरे में उसके चन्दा के नूर की झलक है । 
आँखों में चमकती हैं सितारों की ख्वाहिशें ॥ 

मिलने से बेग़रज़ हैं और दूर भी नहीं। 
इतनी अता हुई हैं किनारों को ख्वाहिशें ॥ 

वो जान मांगते हैं जिनको दिल ये दे दिया । 
मौला मेरे अजब दी हमारों को ख्वाहिशें ॥